कल जब दिन में दसवी बार 'hey wassup ' सुना और सुनाया तो लगा
मुझे अंग्रेजियत से कोफ़्त होने लगी है
ऐसी बात नहीं की मुझे गैर-ज़बानी शब्द पसंद नहीं हैं
shakespeare और milton जैसे पराये मर्दों से भी मोहब्बत है
ऐसा नहीं की मुझे cappuccinno से प्यार नहीं है
ऐसा भी नहीं की pizza exotica देख मेरी लार नहीं टपकती
ऐसा भी नहीं है की mexican dishes के नाम लेते लेते
मेरी ज़बान खुशी से औन्धी नहीं हुई जाती
पर वो कहते हैं न, बिस्कुट जब तक खौली हुई चाय में डुबाओ ना
जब तक गरम फुल्के पर घी और गुड का लेप लगाओ ना
जब तक तरकारी को उसके नाम से बुलाओ ना
तब तक स्वाद तो कहीं फसा ही रहता है
सबेरे जब दादाजी ने ठहाका लगा कर
"grand -daughter ' कहा , तो बड़ा अजीब सा लगा
उनका कुर्ता पकड़ पगडंडियों पर चलने वाली
उनकी पोती कहाँ गयी आखिर?
आज कल जब मैं बड़ों को प्रणाम करती हूँ तो
एक तुच्चा सा hullo बेटा, ही मिल पाता है
जब मैं आप कहती हूँ किसी को
तो वो बगली झाँकने लगता है, बुजुर्गियत के डर से
बड़ा मन करता है की किसी से
आत्मीयता में बात करून , ना इंग्लिश में ना हिंगलिश में
जब मैं कहूं की बहोत दिन हुए गप्पबाजी किये
तो कोई lets chat का उसपे रोलर ना चला दे
जैसा मैंने कहा, ऐसा नहीं की मुझे अंग्रेज़ी से परहेज है
ऐसा भी नहीं की बिना सर पैर बातें करना मुझे अच्छा नहीं लगता
मैं भी यहीं की हूँ, इन सब की आदत तो है ही मुझे
बस बात ये है की मुझे अंग्रेज़ी से नहीं, अंग्रेजियत से थोड़ी अनबन है
थोड़ी अनबन इसलिए कह रही हूँ क्योंकी
मैं खुद इसकी ग्राहक हूँ
हर रोज़ ही mornin से दिन शुरू करती हूँ
और mwa and hugs से खत्म करती हूँ
पर जब मैंने पाया की
माँ को mom बना दिया है और उनके 'इस्मार्ट' से चिढने लगी हूँ
वो जब दाल में घी डालने की बात करती हैं तब मैं उन्हें fat -free के भाषण देने लगी हूँ
बस तब से मुझे अंग्रेजियत से थोड़ी कोफ़्त होने लगी है..
1 comment:
ekdum different pali...keep it up !
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